कैसे मना लूँ ये दिवाली ,
मेरे घर लगा है ,दीपक का मेला ,
तो उस घर है ,आँशुओ का बसेरा ,
निभा दिया उसने अपना हर वादा ,
अपनी आखरी साँस तक सरहद पर लड़ा ,
सांसे उखड़ रही थी ,आँखे बंद हुई जा रही थी ,
जूनून था बस दुश्मन से हर न मानना,
आया इस दिवाली वो अपने घर ,तिरंगे मे लिपटकर ,
बस वो चुप था ,चेहरे पर वही तेज़ था ,
माँ अब अपना ख़ुद से ख्याल रखना ,
हर दिवाली पर ,पूरा घर हमेशा की तरह रोशन करना ,
माँ मे रहुगा हमेशा तेरे पास ,दीपक की इस लौ मे जलकर ...
मेरे घर लगा है ,दीपक का मेला ,
तो उस घर है ,आँशुओ का बसेरा ,
निभा दिया उसने अपना हर वादा ,
अपनी आखरी साँस तक सरहद पर लड़ा ,
सांसे उखड़ रही थी ,आँखे बंद हुई जा रही थी ,
जूनून था बस दुश्मन से हर न मानना,
आया इस दिवाली वो अपने घर ,तिरंगे मे लिपटकर ,
बस वो चुप था ,चेहरे पर वही तेज़ था ,
माँ अब अपना ख़ुद से ख्याल रखना ,
हर दिवाली पर ,पूरा घर हमेशा की तरह रोशन करना ,
माँ मे रहुगा हमेशा तेरे पास ,दीपक की इस लौ मे जलकर ...