हर रोज़ वही धुँआ ,
हर रोज़ वही नफरत ,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन ,
अपनों को ही सही राह दिखाने को,
घर वापसी की बाट जोहे ,
प्रेम और सौहार्द से शांति लाने को ,
अपने लाल खो चुकी उस माँ की हर पुकार पर ,
इस वादी ने अपनी बेबसी ही दिखाई है ,
हर रोज़ कितनी चीखे यहां दफ़न होती है ,
हर रोज़,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन|
हर रोज़ वही नफरत ,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन ,
अपनों को ही सही राह दिखाने को,
घर वापसी की बाट जोहे ,
प्रेम और सौहार्द से शांति लाने को ,
अपने लाल खो चुकी उस माँ की हर पुकार पर ,
इस वादी ने अपनी बेबसी ही दिखाई है ,
हर रोज़ कितनी चीखे यहां दफ़न होती है ,
हर रोज़,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन|
